प्रतिभूतियाँ जारी करने के विभिन्न तरीकों (Methods of Issuing Securities)

 📢 निवेश की शुरुआत: कैसे कंपनियाँ जारी करती हैं प्रतिभूतियाँ?

किसी भी कंपनी के लिए ग्रोथ और एक्सपेंशन के लिए फंड्स की ज़रूरत होती है। यह फंड इक्विटी या डेट के ज़रिए जुटाया जा सकता है। Securities Market, खासतौर से Primary Market, कंपनियों को नए निवेशकों से पूंजी जुटाने का अवसर देता है।

इस ब्लॉग में हम विस्तार से जानेंगे कि कंपनियाँ कैसे Securities Issue करती हैं – यानी किन-किन तरीकों से वो बाजार से पूंजी जुटाती हैं।


📌 Primary Market – पूंजी जुटाने का प्रथम मंच

Primary Market वह प्लेटफ़ॉर्म है जहाँ कंपनियाँ पहली बार नई प्रतिभूतियाँ (Securities) जारी करती हैं। यह निवेशकों से पूंजी जुटाने का मूल स्त्रोत होता है। यहां जारी प्रतिभूतियाँ पब्लिक को सीधे कंपनी द्वारा ऑफर की जाती हैं।


🔹 प्रमुख तरीक़े जिनसे कंपनियाँ प्रतिभूतियाँ जारी करती हैं:

1️⃣ Public Issue (सार्वजनिक निर्गम)

इसमें कंपनियाँ आम जनता को प्रतिभूतियाँ जारी करती हैं। कोई भी पात्र निवेशक इस इश्यू में हिस्सा ले सकता है। यह एक Retail-Oriented Method है, जहाँ निवेशकों की संख्या बड़ी होती है।


2️⃣ IPO – Initial Public Offering

जब कोई कंपनी पहली बार अपने Equity Shares को पब्लिक को बेचती है, उसे IPO कहा जाता है।

IPO का उद्देश्य:

  • बिजनेस एक्सपेंशन के लिए कैपिटल जुटाना

  • मार्केट में ब्रांड प्रेजेंस बनाना

  • निवेशकों को एग्जिट का अवसर देना (Promoters या VC investors के लिए)

SEBI Guidelines के अनुसार:

  • कंपनियों को Net Tangible Assets, Profitability और Net Worth की न्यूनतम पात्रता पूरी करनी होती है।

  • शेयरों की लिस्टिंग अनिवार्य होती है।

  • शेयर Demat Form में होने चाहिए।

  • Retail Investors के लिए कम से कम 35% शेयर आरक्षित रहते हैं।

  • Qualified Institutional Buyers (QIBs) को अधिकतम 50% तक शेयर आवंटित किए जा सकते हैं।

🧲 Anchor Investors:
SEBI ने 2009 में Anchor Investors की concept शुरू की। ये बड़े QIBs होते हैं जो कम से कम ₹10 करोड़ का निवेश करते हैं। Anchor निवेशकों की बिड IPO खुलने से एक दिन पहले लगती है और ये इश्यू की विश्वसनीयता बढ़ाते हैं।


3️⃣ FPO – Follow-on Public Offering

जब कोई पहले से लिस्टेड कंपनी दुबारा पब्लिक को shares ऑफर करती है, उसे FPO कहते हैं।

FPO का उद्देश्य:

  • ग्रोथ के लिए अतिरिक्त फंड

  • कर्ज चुकाने के लिए पूंजी जुटाना

  • पब्लिक शेयरहोल्डिंग बढ़ाना (regulatory compliance)


4️⃣ Private Placement – निजी प्लेसमेंट

इसमें कंपनी कुछ चुनिंदा निवेशकों को ही सिक्योरिटीज ऑफर करती है, आमतौर पर बड़े निवेशकों को।

📌 Companies Act, 2013 के अनुसार:

  • 50 से अधिक निवेशकों को शेयर ऑफर नहीं किए जा सकते।

  • SEBI और Stock Exchange की लिस्टिंग शर्तें पूरी करनी होती हैं।

🟢 Private Placement के दो प्रमुख प्रकार:

  • QIP – Qualified Institutional Placement:
    केवल QIBs को ही ऑफर किया जाता है, जैसे Mutual Funds, Banks आदि।

  • Preferential Allotment:
    Specific investors को निजी आधार पर शेयर दिए जाते हैं।


5️⃣ Rights Issue (अधिकार निर्गम)

इसमें मौजूदा शेयरहोल्डर्स को ही अतिरिक्त शेयर खरीदने का अधिकार दिया जाता है, एक निश्चित अनुपात और डिस्काउंट प्राइस पर।

🛠 निवेशकों के पास तीन विकल्प होते हैं:

  1. Rights का उपयोग करें

  2. Rights किसी और को ट्रांसफर करें

  3. Rights को Expire होने दें


6️⃣ Bonus Issue (बोनस निर्गम)

कंपनी मौजूदा शेयरधारकों को बिना किसी चार्ज के अतिरिक्त शेयर देती है।
✅ यह तब होता है जब कंपनी के पास पर्याप्त Retained Earnings होती है।
✅ इससे Share Capital बढ़ता है लेकिन निवेशक से कोई पैसा नहीं लिया जाता।


7️⃣ OFS – Offer for Sale

OFS में कंपनी कोई नया शेयर इश्यू नहीं करती, बल्कि मौजूदा प्रमोटर्स या बड़े शेयरधारक अपने शेयर बेचते हैं।

👉 इसे SEBI ने खास तौर पर लिस्टेड कंपनियों के लिए बनाया है, ताकि वे अपनी सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ा सकें।

📌 उदाहरण: भारत सरकार द्वारा PSU Disinvestment OFS के ज़रिए किया जाता है।


8️⃣ Sweat Equity

जब कोई कंपनी अपने Employees, Promoters या Tech Contributors को उनकी सेवाओं के बदले में शेयर देती है, तो इसे Sweat Equity कहा जाता है।

👉 इसका उद्देश्य कर्मचारियों को motivate करना होता है, न कि पूंजी जुटाना।


9️⃣ ESOP – Employee Stock Option Plan

ESOP के तहत कंपनियाँ अपने कर्मचारियों को एक निश्चित कीमत पर भविष्य में शेयर खरीदने का विकल्प देती हैं।

📅 इसमें Vesting Period होती है (अक्सर 1 साल या उससे अधिक)।
📈 कर्मचारियों को फायदा तभी होता है जब मार्केट प्राइस, एक्सरसाइज़ प्राइस से ज्यादा हो।


🔟 Onshore और Offshore Offerings

  • Onshore: जब कंपनी भारतीय मार्केट से पूंजी जुटाती है।

  • Offshore: जब विदेशी निवेशकों से विदेशी बाज़ारों में फंड जुटाया जाता है।

📌 उदाहरण: ADR, GDR आदि विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर।


🔚 निष्कर्ष

आज के दौर में कंपनियों के पास पूंजी जुटाने के लिए कई विकल्प मौजूद हैं — IPO, FPO, QIP, Rights Issue, OFS, और भी बहुत कुछ। हर तरीके का अपना उद्देश्य और निवेशक वर्ग होता है।

निवेशकों के लिए, इन तरीकों को समझना बेहद जरूरी है ताकि वे सही समय पर सही अवसर का लाभ उठा सकें।


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